Monday, January 8, 2018

                                        “SURNAME की लड़ाई

Surname जी हां,यू तो एक बहुत ही आम शब्द, जो हमारे बीच वर्षो से चला आ रहा, surname को हम उपनाम से भी संबोधित करते है|भारत की इतिहास में देखे तो काफी समय से उपनाम रखने की प्रचालन चलती आ रही है. उपनाम हमारे नाम के ठीक बाद लगाया जानेवाला नाम है, जो शायद हमारे पुराने ईतिहास की एक छवि के तौर पर भी प्रदर्शित करती  है|आज की बात करे तो, आज हमारे समाज में उपनाम की होर मची है,समाज के हर वर्ग से लेकर धर्म जाति के अनुशार लोग उपनाम का चयन करते है| जो कहीं न कहीं उनके इतिहाश को भी प्रदर्शित करती है, अगर भारतीय राजनीति की बात करे तो भारत के राजनीति में उपनाम का बहुत महत्व है, उपनाम देख कर लोग अपनी वोट बैंक देखते है|
अगर सामाजिक दृष्टिकोण से देखे तो उपनाम हमारे समाज को विभाजित  की ओर ले जा रहा है|आज उपनाम के वजह से लोगो में एक जलन दृष्टि की भावना भी आ गयी है,ये जानकर की उपनाम का इतिहास कितना मजबूत था या कमज़ोर , उपनाम से इनकी जातियों और धर्म पे भी पूरा असर होता है, जो की एक बड़ी वजह है, लोगो में इर्ष्या का आना, अगर यह उपनाम न हो, तो शायद हमारे समाज से लोगो की मानशिकता में बदलाव होगा|और लोग सबको एक नज़र में देखेंगे |


Thursday, January 4, 2018

"रंग भेद "

रंग भेद



रंग भेद, जी हां, सुनने में तो यह शब्द कोई खाश मायने नहीं रखता.परन्तु इस शब्द की गहराई बहुत ज्यादा है,यू तो भगवान द्वारा बने गयी हर रंग सर्वोपरी है,लेकिन जब हम अपने समाज मे देखे, तो यह बिलकुल अलग लगता है,
                       एक और जहाँ गोरे रंग की  अहमियत है,वही हमारे समाज में इसके विपरीत रंग को लोग बहुत ही नीच दृष्टि से देखते है| भारत की बात करे तो यहाँ भी गोरे रंग की प्राथिमिकता दी जाती है,लेकिन अफरीकाई देशो में काले रंग के अह्मियात्ता ज्यादा है,
               आये दिन रंग भेद के कारण लोगो में भेदभाव हीन भावना भी पनपने लगी है|जिस कारण समाज का खाश वर्ग भी प्रभावित हो रहा है|आज भारत में जब भी शाद्दी के बात होती है,तो लोग गोरे रंग को ही अहमियत देते है|जिस कारण आये दिन लड़के लडकियों के शाद्दी भी टूट जाती है,इस कारण हमारा समाज दो भागो में बांट गया है,गोरा और कला|
                    हमें, यह होना चाहिए की हम समाज और यहाँ रहने वालो को एक नज़र से ही देखे, और इस सामाजिक कुरीतियों को ख़तम करे और रंग भेद बंद करे|


Friday, November 24, 2017

दहेज् प्रथा एक् कुरिति ...

                  " दहेज़ प्रथा"

दहेज़ प्रथा, यह शब्द् सुनते ही हमारे दिमाग में एक ऐसा चित्र बनता है,जो एक लाचार पिता अपनी बेटी के लिए वर पक्ष के पिता के पैरो में गिरा है।
आज भारत में तकरीबन हर राज्य में 'दहेज़ प्रथा' प्रचलित है,दहेज़ हमारे समाज के लिए अभिसाप है, लेकिन अभी भी समाज में कुछ लोग जो पुराणी मानशिकता के साथ रह रहे है,उन्हें और जागरूक करने की आवश्यकता है।
आज हमारे समाज में जब लडकिया शाद्दी करके जाती है,तो वो किस तरह प्रताड़ित होती है।इस से हम सब वाकिफ है,लडकिया को इतना परेशान किया जाता है,की कभी कभी तो लडकिया आत्महत्या कर लेती है।और फिर भी समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता है। समाज तमाशबीन बना रहता है।
ऐसा नहीं है की दहेज़ प्रथा के लिए सरकार ने कानूम नहीं बनाया है, हमारे यहाँ कड़े कानून है। फिर भी यह मानशिकता ऐसे हे चल रही है।
दहेज़ प्रथा को रोकने के लिए हमें आगे बढ़कर लोगो को जागरूक करना चाहिए,और नक्कड़ नाटक और मानव सृंखला के माध्यम से लोगो की मानशिकता को बदलनी चाहिए। और दहेज़ को ना कहना चाहिये हमेसा के लिए।
Amit kumar
( अमित कुमार)
पटना।

                                        “ SURNAME ” की लड़ाई ” Surname जी हां,यू तो एक बहुत ही आम शब्द, जो हमारे बीच वर्षो से चला आ र...